न्याय प्रणाली में प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग एक सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए – न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह

चण्डीगढ़, 28 मार्च – भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने कहा कि न्यायिक प्रणाली में प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग न्याय प्रक्रिया को सुगम और प्रभावी बनाने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी सदैव न्यायाधीशों की होनी चाहिए।

न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने यह बात आज राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय तथा चंडीगढ़ न्यायिक अकादमी के सहयोग से ‘‘प्रौद्योगिकी के माध्यम से कानून की भूमिका को आगे बढ़ाना ‘चुनौतियाँ और अवसर‘ विषय पर आयोजित क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान सम्बोधित करते हुए कही।

उन्होंने कहा कि न्याय केवल मामलों का तकनीकी या यांत्रिक तरीके से निपटारा करने का विषय नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। तकनीक, एल्गोरिदम और एआई न्यायिक प्रणाली को जानकारी उपलब्ध कराने और प्रक्रियाओं को तेज करने में सहायक हो सकते हैं, लेकिन इन्हें न्याय देने वाले के रूप में नहीं देखा जा सकता। वर्तमान परिस्थितियों में न्यायिक निर्णय का अधिकार और जिम्मेदारी न्यायाधीशों के पास ही रहनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों में अपार संभावनाएं हैं और वे न्यायिक प्रणाली में पारदर्शिता तथा दक्षता बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। हालांकि यह भी आवश्यक है कि इन तकनीकों का लाभ आम नागरिकों और वादियों तक प्रभावी ढंग से पहुँचे तथा उन्हें इनके उपयोग के बारे में पर्याप्त जानकारी और प्रशिक्षण दिया जाए।

न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने कहा कि तकनीक का उद्देश्य न्याय को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होना चाहिए। न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और अन्य संस्थाओं के बीच सहयोग पर बल देते हुए कहा कि न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए केवल समस्याओं को सामने लाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस और व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करने होंगे।

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति शील नागू ने न्यायिक क्षेत्र में प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका पर बल देते हुए कहा कि तकनीक न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और सुलभ बनाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है, किन्तु इसके उपयोग में न्याय के मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानून का शासन केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक के लिए न्याय, निष्पक्षता और समानता का भरोसा है। उन्होंने कहा कि अदालतों के हर आदेश और प्रत्येक कार्यवाही का उद्देश्य इसी भरोसे को मजबूत करना होता है। वर्तमान समय में प्रौद्योगिकी ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और न्याय प्रणाली भी इससे अछूती नहीं है। अदालतों में प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, रिकॉर्ड का इलेक्ट्रॉनिक रूप में संरक्षण तथा संचार के आधुनिक माध्यमों ने न्यायिक कार्यप्रणाली को अधिक तेज और प्रभावी बनाया है।

उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांत-निष्पक्षता, पारदर्शिता, सुलभता और तर्कसंगत निर्णय हमेशा सर्वोपरि रहने चाहिए। तकनीक न्यायिक प्रक्रिया में सहायक हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय और जिम्मेदारी हमेशा न्यायाधीश की ही रहेगी। तकनीक ने प्रक्रियाओं को सरल बनाया है और देरी को कम करने में मदद की है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि सीमित संसाधनों वाले नागरिकों के लिए न्याय तक पहुँच बाधित न हो। न्याय व्यवस्था समावेशी होनी चाहिए और समाज का कोई भी वर्ग तकनीकी बदलावों के कारण न्याय से वंचित महसूस न करे।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था में प्रौद्योगिकी की भूमिका लगातार बढ़ रही है, लेकिन न्याय देने की अंतिम शक्ति हमेशा मानव के विवेक और संवेदनशीलता के पास ही रहनी चाहिए। उन्होंनेे कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा देश के पाँच क्षेत्रों के लिए प्रतिवर्ष दो क्षेत्रीय बैठकें आयोजित की जाती हैं, जिनमें न्यायपालिका से जुड़े समकालीन विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श किया जाता है। आज न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक ने महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। यह न केवल न्यायाधीशों के लिए प्रशासनिक सहायता और कानूनी शोध का माध्यम बन रही है, बल्कि कुछ मामलों में निर्णयों के संभावित परिणामों का अनुमान लगाने में भी उपयोग की जा रही है।

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुवीर सहगल ने क्षेत्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के अवसर पर उपस्थित गणमान्य अतिथियों, न्यायाधीशों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सम्मेलन में दिए गए प्रेरणादायक संबोधन तथा संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए दूरदर्शी मार्गदर्शन से न्यायिक व्यवस्था को नई ऊर्जा प्राप्त होती है। न्यायमूर्ति श्री सुधीर सहगल ने विश्वास व्यक्त किया कि सम्मेलन के आगामी तकनीकी सत्रों में होने वाली चर्चाएँ अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी और डिजिटल युग में कानून के शासन को और अधिक सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी।

इस अवसर पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख, उत्तराखंड, इलाहाबाद तथा पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और उत्तर क्षेत्र से अनेक प्रतिभागी उपस्थित रहे।

By Balwinder Singh

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