रूमेटोलॉजिकल रोग: भारत में बढ़ता बोझ, जागरूकता और समय पर इलाज से ही बचाव संभव—पीजीआईएमईआर विशेषज्ञ

चंडीगढ़ (नवल किशोर): रूमेटोलॉजिकल रोग जागरूकता माह के अवसर पर, पीजीआईएमईआर के आंतरिक चिकित्सा विभाग के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी प्रभाग के विशेषज्ञों ने मीडिया को संबोधित करते हुए रूमेटोलॉजिकल रोगों को भारत में एक प्रमुख किंतु उपेक्षित जनस्वास्थ्य चुनौती के रूप में पहचानने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस अवसर पर पीजीआईएमईआर की रूमेटोलॉजी देखभाल और शिक्षा में अग्रणी भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया गया कि वर्ष 1971 में भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल में देश का पहला समर्पित रूमेटोलॉजी केंद्र स्थापित किया गया, जो विशेष रोगी देखभाल और अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ।

इस अवसर पर बोलते हुए, प्रो. अमन शर्मा, अध्यक्ष, इंडियन रूमेटोलॉजी एसोसिएशन ने बताया कि रूमेटिक एवं मस्कुलोस्केलेटल (RMSK) रोग भारत की लगभग 25–30% आबादी को प्रभावित करते हैं, और ये देश में विकलांगता के शीर्ष 25 कारणों में शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार, लगभग पाँच में से एक मरीज को गंभीर विकलांगता का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता और आत्मनिर्भरता प्रभावित होती है। चिंताजनक रूप से, 25–49 वर्ष आयु वर्ग—जो आर्थिक रूप से सबसे अधिक उत्पादक है—में विकलांगता का सबसे अधिक बोझ देखा जाता है, जिससे सामाजिक-आर्थिक प्रभाव भी व्यापक रूप से पड़ता है।

सामान्य भ्रांतियों का खंडन करते हुए, विशेषज्ञों ने बताया कि आर्थराइटिस कोई एक रोग नहीं बल्कि 100 से अधिक विभिन्न स्थितियों का समूह है, जिसमें रूमेटाइड आर्थराइटिस, ल्यूपस, वैस्कुलाइटिस, स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस और कनेक्टिव टिश्यू रोग शामिल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये रोग केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं हैं, न ही हर जोड़ दर्द यूरिक एसिड के कारण होता है, और सभी मामलों में आजीवन उपचार आवश्यक नहीं होता।

कमर दर्द, सॉफ्ट टिश्यू रूमेटिज्म और फाइब्रोमायल्जिया जैसी स्थितियाँ ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाई जाती हैं। अध्ययनों के अनुसार, लगभग 37% रूमेटाइड आर्थराइटिस मरीजों में गंभीर कार्यात्मक अक्षमता देखी जाती है, जबकि लगभग 22% मरीजों की कार्य क्षमता प्रभावित होती है।

विशेषज्ञों ने भारत में प्रशिक्षित रूमेटोलॉजिस्ट की भारी कमी को एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा के स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर रूमेटोलॉजी का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। यह कमी विशेष रूप से प्रशिक्षित नर्सों, फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट जैसे सहयोगी स्वास्थ्य कर्मियों में भी देखी जाती है।

चिकित्सा विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सुझाव दिए:

सामुदायिक आधारित स्वास्थ्य कार्यक्रमों का विकास

रूमेटोलॉजी प्रशिक्षण में निवेश बढ़ाना

बहु-विषयक (मल्टीडिसिप्लिनरी) देखभाल मॉडल को सुदृढ़ करना

उन्होंने कहा, “शीघ्र निदान और समय पर उपचार से विकलांगता को काफी हद तक कम किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। जन-जागरूकता, क्षमता निर्माण और नीतिगत प्राथमिकता इस बढ़ते बोझ से निपटने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।”

प्रेस कॉन्फ्रेंस का समापन 26 अप्रैल को पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ से सुखना झील तक आयोजित जागरूकता वॉक में भाग लेने के आमंत्रण के साथ हुआ, तथा आम जनता और स्वास्थ्य हितधारकों से अपील की गई कि वे शुरुआती लक्षणों को पहचानें, स्वयं दवा लेने से बचें और विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लें। सही दृष्टिकोण अपनाने पर कई रूमेटोलॉजिकल रोगों का प्रभावी प्रबंधन संभव है, जिससे मरीज सक्रिय और उत्पादक जीवन जी सकते हैं।

By Gurpreet Singh

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