नई दिल्ली (राजीव शर्मा): उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया है कि किसी धर्म की प्रथा में अंधविश्वास है या नहीं, यह पहचानने का पूरा अधिकार अदालत के पास है। कोर्ट की यह टिपण्णी केंद्र सरकार के उस तर्क को खारिज करते हुए आई कि धार्मिक मामलों में दखल अदालत का दायरा पार करता है।
प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगवाई वाली नौ जजों की बेंच धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और संविधान के अनुच्छेद 25 के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर बहस कर रही है। केरल के शबरीमला मंदिर का मामला केंद्र में है, जहां पहले 2018 में प्रतिबंध हटा था, फिर 2019 में इसे बड़ी बेंच को भेज दिया गया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत सुधार कानून बनाना संसद या राज्य विधानसभाओं का अधिकार है और काला जादू जैसे कानूनों का हवाला देकर बोले—अदालत यह कैसे तय करेगी कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने इसके जवाब में कहा कि प्रथा अंधविश्वास है या नहीं, यह तो कोर्ट तय करेगा ही। उसके बाद विधायिका आगे बढ़ें —लेकिन उनका फैसला अंतिम नहीं। मेहता ने आगे कहा कि धर्मनिरपेक्ष अदालत धार्मिक विशेषज्ञता के बिना प्रथा को खारिज नहीं कर सकती।
जस्टिस बीआर नागरत्ना ने कहा कि प्रथा को उसी धर्म के दर्शन से परखनी चाहिए। बाहरी नजरिए से असल धार्मिकता नकारना गलत है लेकिन स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन ही सब कुछ चले।
अंधविश्वास को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, “कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं, अदालत को यह तय करने का हक है”
